
पद्मभूषण तीजन बाई के निधन से एक युग का अवसान: कई पुरस्कारों से लेकर देश विदेश का सफ़र और एक वर्जना को तोड़कर तीजन बाई बनने की कहानी।
रायपुर/दुर्ग, 5 जुलाई। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को विश्व पटल पर पहचान दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त पंडवानी गायिका और पद्मभूषण सम्मान से अलंकृत तीजन बाई का रविवार सुबह 3:10 बजे रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में उपचार के दौरान निधन हो गया। वे लंबे समय से अस्वस्थ थीं और उनका इलाज चल रहा था। उनके निधन से छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश के कला एवं संस्कृति जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके निधन की पुष्टि निज सचिव मनहरण सार्वा ने की है।
छत्तीसगढ़ की मिट्टी में रची बसी आवाज़ की तीजन बाई अब अनंत यात्रा पर निकल गईं।
दुर्ग जिले की निवासी तीजन बाई ने अपनी अद्भुत गायन शैली, दमदार प्रस्तुति और सशक्त अभिनय के माध्यम से पंडवानी को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने महाभारत की कथाओं को अपनी अनूठी शैली में प्रस्तुत कर देश-विदेश के लाखों दर्शकों का दिल जीता।
गरीबी और संघर्ष से शुरू हुआ सफर
तीजन बाई का जन्म 24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक साधारण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उन्हें महाभारत की कथाएं सुनने और गाने का शौक था। सामाजिक विरोध और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने अपने जुनून को नहीं छोड़ा।
महिलाओं के लिए उस दौर में पंडवानी की ‘कापालिक शैली’ में प्रस्तुति देना वर्जित माना जाता था, इस वर्जना को तोड़कर तीजन बाई ने मंच पर अपनी अलग पहचान बनाते हुए देश और विदेश तक में छत्तीसगढ़ की संस्कृति का रंग का बिखेरा।
तीजन बाई ने भारत के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, रूस, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी समेत अनेक देशों में पंडवानी की प्रस्तुति देकर छत्तीसगढ़ की लोककला का डंका बजाया। उनकी कला की सराहना देश-विदेश में हुई।
अनेक राष्ट्रीय सम्मान से हुईं सम्मानित
तीजन बाई को कला क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले, जिनमें प्रमुख हैं—
पद्मश्री (1988)
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1995)
पद्मभूषण (2003)
नृत्य शिरोमणि सम्मान
संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप
पद्म विभूषण (2019)
कला जगत के लिए अपूरणीय क्षति
तीजन बाई एक लोकगायिका ही नहीं नहीं अपितु अविभाजित मध्य प्रदेश के समय से ही वर्तमान में छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक थीं। उन्होंने अपने जीवन के छह दशक लोककला को समर्पित किए कर नई पीढ़ी को पंडवानी की समृद्ध परंपरा से जोड़ा।
उनके निधन पर मुख्यमंत्री, जनप्रतिनिधियों, साहित्यकारों, कलाकारों और विभिन्न सामाजिक संगठनों ने गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति के लिए अपूरणीय क्षति बताया है।
तीजन बाई के निधन से पंडवानी का एक युग समाप्त हो गया, मगर उनकी संस्कृति से जुड़ी आवाज़ व उनकी कला आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा प्रेरणा बनी रहेगी।
