2 महीने में दूसरी बार रेपो रेट : RBI

 

बढ़ती मंहगाई से चिंतित रिजर्व बैंक ने दो माह से भी कम समय में लगातार दूसरी बार प्रमुख नीतिगत दर रेपो में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि कर दी. इससे रेपो रेट की दर 6.25 से बढ़कर 6.50 हो गई है. रेपो रेट वो दर है जिसपर रिज़र्व बैंक बैंकों को कर्ज़ देता है. रेपो रेट बढ़ने का मतलब है कि बैंक भी दरों में बदलाव करेंगे, जिसके बाद घर और गाड़ियों के लिए जाने वाले लोन महंगे हो सकते हैं. हालांकि, केन्द्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष के दौरान आर्थिक वृद्धि के अपने अनुमान को पूर्ववत 7.4% पर बरकरार रखा है.

 

रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) के पांच सदस्यों ने रेपो दर में वृद्धि के पक्ष में मत दिया. इसके बाद रेपो दर को 6.25 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.50 प्रतिशत करने का फैसला कर दिया गया. हालांकि, समिति ने नीतिगत रूख को ‘तटस्थ’ बनाये रखा है.    इससे पहले जून में भी एमपीसी ने रेपो दर में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि की थी.रिवर्स रेपो दर पर रिजर्व बैंक बैंकों में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी को वापस उठाता है. व्यापक तौर पर यह माना जा रहा है कि अक्तूबर में दर में एक और वृद्धि से पहले रिजर्व बैंक खरीफ फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) में की गई वृद्धि के पूरा प्रभाव पड़ने, मानसून की प्रगति और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत परिणाम की प्रतीक्षा करेगा. बहरहाल, उसने दर में 0.25 प्रतिशत की वृद्धि करने का यह कदम पहले से ही मुद्रास्फीति के खतरे को भांपते हुये उठाया है.रिजर्व बैंक को लगता है कि 2019-20 की पहली छमाही तक मुद्रास्फीति धीरे धीरे बढ़ती हुई पांच प्रतिशत तक जा सकती है. यही वजह है कि उसने रेपो दर में वृद्धि का यह कदम उठाया है. रेपो दर वह दर होती है जिस पर वाणिज्यक बैंक रिजर्व बैंक से अल्पकालिक नकदी प्राप्त करते हैं. अब यह दर 6.50 प्रतिशत कर दी गई है. इसके साथ ही रिवर्स रेपो दर भी इसी अनुपात में बढ़कर 6.25 प्रतिशत हो गई है.

 

रिजर्व बैंक गवर्नर ने भी चेतावनी के लहजे में कहा, ‘हम ने उठापटक वाले कुछ महीनों को देखा है और ऐसा लगता है कि आगे भी यह स्थिति बनी रहेगी. कितने समय तक रहेगी कहना मुश्किल है. व्यापारिक देश शुल्क युद्ध में लिप्त हैं और लगता है कि यह मुद्रा युद्ध की भी शुरुआत हो रही है.’’    उद्योग जगत ने रेपो दर में की गई वृद्धि को हालांकि उम्मीद के अनूरूप बताया लेकिन कहा कि केन्द्रीय बैंक को आर्थिक वृद्धि के साथ संतुलन बिठाना चाहिये.    सरकार ने रिजर्व बैंक के कदम पर कहा है कि खरीफ फसलों के एमएसपी में हुई वृद्धि का असर धीरे धीरे सामने आयेगा, इसलिये हमें लगता है कि यह मुद्रास्फीति के लिये गंभीर जोखिम नहीं है.’’ एमपीसी ने कहा है कि वैश्विक बाजारों में बढ़ता संरक्षणवाद वैश्विक वृद्धि के लिये निकट भविष्य और दीर्घकालिक जोखिम पैदा कर सकता है. इसका निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव होगा और उत्पादकता तथा वैश्विक आपूर्ति पर असर पड़ सकता है.